Saturday, 27 December 2014
Sunday, 9 February 2014
क्या चाय वाला होना ही प्रधानमंत्री बनने के लिए काफी है?
अख़िर क्यों BJP मोदी को चायें वाले के तोर पर प्रचारित कर रही है? क्या चाय वाला होना ही प्रधानमंत्री बनने के लिए काफी है? जनता की हमदरदी के साथ ही इसकी एक वजहा हमारे लोगों की यह सोच भी है, कि ग़रीब हमेशा ग़रीब के दुख को समझता है तथा उसकी सहायता करता है तथा ना कि कोई आमीर। वो कहावत है न: जिसके पाँव ना फटी बयाई वो क्या जाने पीड़ पराई। क्या मोदी जी इस सोच पर खरे उतरते है?
व्यपारीयों को सम्मेलन में मोदी बताते हैं कि उन्हेने माँ को लोगों के घर काम करके देखा हे, वह बताते है कि किस तरहा कम उम्र में परिवार की मदद के लिये चायें बेचने का काम करना पड़ा। अपने बचपन को याद करना अच्छा है। पर 2002 के दंगों में मारे गये लोगों के अनाथ बच्चों को देख कर मोदी जी को अपना बचपन याद क्यों नहीं आता? क्यों उन बच्चों की लाचारी और ग़रीबी में मोदी जी को अपना बचपन नज़र नहीं आता? क्यों उन लोगो की विधवाओं की बेबसी और लाचारी में उन्हे अपनी माँ का संघर्ष नज़र नहीं आता? क्यों उनकी अवस्था देख कर उन्हे कुत्ते का बच्चा याद आता हे, पर अपना बचपन नहीं?
मोदी जी कहते कि उन्होंने परिश्रम और दर्ढ़ता जेसै गुण अपनी माँ से सीखे हैं, पर काश उनकी माता उन्हे सबसे ज़रूरी: हमदर्दी, सदभावना और द्वेष ना रखना जैसै गुण भी सिखा पाती। यह हमदर्दी और सदभावना की कमी है कि उन्हे पीड़ित परिवारों का दुख नज़र नहीं आया।
यह उनका ग़रीबी और लाचारी कि प्रती द्वेष ही था कि उन्होंने कुछ कर गुजरने की चाह में अपने परिवार और पत्नी को छोड़ने में वक़त नहीं लगाया। यह वो द्वेष ही था कि इन्हेंने कभी दोबारा उस शहर याँ अपने परिवार का रुख़ नहीं किया जिस के लोगों ने इनकी ग़रीबी और मजबूरी देखी थी। ये तो दिल्ली में AAP की जीत है जिसने आम आदमी के राजनीति के केंद्र में ला दीया और मोदी जी को उस दौर का सहारा लेना पड़ा, जिसे वो कब का भुला गए थे। वैसे भी चार्टीड पलैन में सफ़र करने वाले और अदानी, आंमबानी तथा टाटा के साथ बैठने वाले मोदी का ग़रीबी से क्या वास्ता।
खेर इस गरीबी के प्रती द्वेष से पैदा हुऐ संघर्ष ने धीरे-धीरे इन्हें एक लालची, ॹीद्दी और मौक़ापरस्त इन्सान में बदल दिया। पहले गुजरात की सत्ता की लालसा, फिर उसे बरक़रार रखने की लालसा में साम्प्रदायिक और विभाजनकारी संगठनों का समर्थन। 2002 के दंगों में अपनी प्रशासनिक ग़लतियों को ना मानने की ज़िद्ग तथा दोषियों का खुला समर्थन। ख़ुद को मज़बूत करने के लिये मौका मिलते ही VHP और जोशी से मुँह फेर लेना। प्रधानमंत्री बनने के लालच में अपने ही संरक्षक अडवानी के नीचा दिखाना और चमचों से अपमानित करवाना । यह वो कमियाँ है जिन्हें कोई नाकार नहीं सकता, आँखे भले ही मुँद ले।
माना कि मोदी एक दर्ढ इन्सान है और उनके राज में गुजरात में विकास हुआ है, पर क्या यह प्रधानमंत्री बनने के लिए काफ़ी है? जवाब है नहीं, जो 15साल के शासन में अल्पसंख्यको के अधिकारो की रक्षा ना कर सका हो, जो लोकतंत्र के बावजूद सत्ता को व्यक्ति केंद्रित कर रहा हो और विरोध में उठी हर आवाज़ निर्कुश्ता से दबा रहा हो, एसे आदमी का समर्थन करना देश और समाज के लिए घातक है।
यह सही है कि दीन में दैव बसते है, पर कुछ दीन दानव भी हो जाते हैं। इसी लिए में मोदी का विरोध करता हुँ ।
Wednesday, 22 January 2014
AAP के काले अंग्रेज़
"काले अंग्रेज़" यह शब्द कुछ साल पहले तक काफ़ी प्रचलित था। फिर आर्थिक उदारीकरन के साथ -2 यह प्रसंगहीन होता चला गया, पर धन्यवाद हो AAP के नेताओं का जो इसे खोया सम्मान वापिस लोटाने का पुरा प्रयास कर रहे हैं।
काला अंग्रेज़: वह व्यक्ति जो बौद्धिक ज्ञान, धन ओर जाति के अहंकार में दूसरों को नीची नज़र से देखे ओर बल पूर्वक उन्हे दबाते हैं याँ उनका शोषण करते हैं।
क्या भारती का यौगांडा कि महिलाओं पर हमला और विश्वास का मलयालम नर्सौ पर व्यँग करना क्या इसी मानसिकता की और इशारा नहीं करता? कालों यँ दलितों को हिक़ारत की नज़र से देखना, उन्हे अलग मोहल्ले में रहने को मजबूर करना। क्या यह काले अंग्रेज़ कि एक परिभाषा नहीं है?
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